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पुस्तकालय में पुस्तकों को विद्यार्थियों को सौपते समय क्या क्या सावधानियाँ रखनी आवश्यक होती है ?

पुस्तकालय में पुस्तकों को विद्यार्थियों को सौपते समय क्या क्या सावधानियाँ रखनी आवश्यक होती है ?

यदि पुस्तक का प्रथम संस्करण परिग्रहण किया जा रहा है तो इसे (-) चिन्ह से दर्शाया जा सकता है । इसके अतिरिक्त । अथवा प्र. लिख देने से गलतियों की संभावनाओं को और भी कम किया जा सकता है । इस कॉलम को खाली कदापि न छोड़ा जाय ।।
5. प्रकाशन वर्ष Year of publication) पुस्तकें प्रकाशित होने के काफी समय पश्चात् भी अर्जित की जा सकती है । अत: प्रकाशन वर्ष देना बहुत आवश्यक है । इसके साथ ही एक पुस्तक के संस्करण अलग-अलग वर्षा में छपते हैं एवं उनका मूल्य भी अलग-अलग होता है । अत: प्रकाशन वर्ष की सूचना लिखना बहुत महत्वपूर्ण है । इससे पुस्तक की अतिरिक्त प्रतियां खरीदते समय एवं भंडार से हटाते समय (write off) बहुत सहायता मिलती है । प्रकाशित मूल्य की जांच करते समय भी इसकी आवश्यकता होती है ।

6. प्रकाशक (Publisher) 

प्रकाशक का स्थान एवं नाम संक्षेप में लिख दिया जाता है । उदाहरणार्थ "New Delhi" को N.D.तथा Vikas Publishing house को Vikas, यह जानकारी भविष्य में अतिरिक्त प्रतियां मंगवाने, पुस्तक खो जाने एवं मूल्य निर्धारण में बहुत आवश्यक होती है ।
7. खण्ड संख्या (Volume Number) बहु धा पुस्तकें खंडों में भी प्रकाशित होती हैं । प्रत्येक खंड को अलग-अलग परिग्रहण संख्या प्रदान की जाती है । खंड अलग-अलग वर्षों में भी प्रकाशित होते रहते हैं । अत: खंड संख्या अति महत्वपूर्ण जानकारी है । यदि पुस्तक खंड में प्रकाशित नहीं हुई है तो इस कॉलम में (x) का निशान लगा देते हैं ।
8. पृष्ठ तथा आकार (Page and size) पुस्तक की पृष्ठ संख्या तथा उसका अनुमानित आकार लिखने से सहायता मिलती है । इससे बहुत छोटी अथवा बहुत बड़ी पुस्तकों को अलगअलग शैल्फ में रखने की जानकारी प्राप्त की जा सकती है । यदि प्रसूचीकरण में डॉ. रंगनाथन की वर्गीकृत प्रसूचीकरण संहिता "Classfied Catalogue Code" का प्रयोग किया गया है, तब तो यह और भी आवश्यक हो जाता है क्योंकि इस प्रसूचीकरण में अन्य कोई स्थान ऐसा नहीं है जहां से पुस्तक के आकार का पता लग सके । पुस्तक का आकार अनुमानत: सेंटीमीटर में लिखते हैं ।

9. परिग्रहण दिनांक (Accession date) 

दायें पृष्ठ के पहले कॉलम में पुस्तक अर्जन का दिनांक दिया जाता है । इससे यह ज्ञात होता है कि पुस्तक किस तिथि को पुस्तकालय की संपत्ति हो गई है । इस कॉलम को प्रथम कॉलम परिग्रहण संख्या (Accession No.) के साथ भी जोड़ा जा सकता है ।
10. विक्रेता का नाम (suppliers Name) यदि पुस्तक सीधे प्रकाशक से नहीं मंगायी गयी है तो विक्रेता का स्थान तथा नाम संक्षेप में लिख दिया जाता है | यदि सीधे प्रकाशक से ही मंगायी गयी है तो संक्षेप में 'प्र" लिख देते हैं । | 11. प्रकाशक का मूल्य (Published Price) यह अति महत्वपूर्ण कॉलम है | इसमें पुस्तकें खो जाने की स्थिति में पुस्तक का वास्तविक मूल्य पता लगाया जा सकता है | विदेशी पुस्तकों के लिए भारतीय मूल्य अवश्य दें । | 12. देय मूल्य (Price Paid) यह वह मूल्य है जिस पर पुस्तक खरीदी गई है । कुछ पुस्तकों पर कम अथवा अधिक कमीशन मिलता है । कुछ पुस्तकें प्रकाशित मूल्य से भी अधिक मूल्य पर खरीदनी पड़ती हैं, अत: पुस्तक के वास्तविक मूल्य एवं देय मूल्य में अंतर भी हो सकता है । अत: पुस्तक के देय मूल्य की जानकारी परिग्रहण पंजी में देना आवश्यक है ।
| 13. देयक क्रमांक व दिनांक (Bill No. and date) विक्रेता द्वारा प्रस्तुत बिल क्रमांक व दिनांक भी परिग्रहण पंजी में लिख देते हैं जिससे भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर इसका पता लगाया जा सके । प्राय: एक बिल पर अनेकों पुस्तकें खरीदी जाती हैं । ऐसी स्थिति में प्रथम पुस्तक पर यह जानकारी देकर शेष पुस्तकों के लिए "वही" (-do-) लिख सकते हैं ।

14. वाउचर क्रमांक व दिनांक (voucher No and Date) 

बिलों को एक क्रम में व्यवस्थित करके उन्हें बिल रजिस्टर में दिनांक के अनुसार दर्ज किया जाता है और इन्हें इस रजिस्टर का क्रमांक प्रदान कर दिया जाता है | इसे वाउचर क्रमांक कहते हैं । यह वाउचर क्रमांक परिग्रहण पंजी में लिख देने से भविष्य में आवश्यक बिल बिना विलम्ब के ढूंढ कर निकाला जा सकता है ।।
15. वर्गाक (Class No.) यह कार्य प्रसूचीकरण तथा वर्गीकरण कार्य समाप्त होने पर शैल्फ लिस्अ की सहायता से बाद में किया जाता है । इसकी सहायता से किसी भी परिग्रहण की गयी पुस्तक को पुस्तकालय से निकाल कर लाना बहुत आसान हो जाता है ।। |
16. प्रत्याहरण सं. और तिथि (withdrawal No. and Date) पुस्तक जब अपनी जीवन लीला समाप्त कर दे, अर्थात पुस्तक के खो जाने पर, पूरी तरह फट जाने पर और उपयोग योग्य न रहने पर उसे पुस्तकालय में से हटाया जाता है । अत: उसे नियमानुसार प्रत्याहरण पंजी (Withdrawl Register) में चढ़ाया जाता है और प्रत्याहरण पंजी का क्रमांक एवं तिथि परिग्रहण पंजी के इस स्तम्भ (column) में दर्ज कर देते हैं । इससे यह पता चलता है कि उक्त पुस्तक अब पुस्तकालय में नहीं है ।।
कमी-कमी यह स्तम्भ (column) किसी परिग्रहण पंजी में नहीं होता है । ऐसी स्थिति में टिप्पणी के कॉलम से भी यह काम लिया जाता है ।

17. टिप्पणी (Remarks) 

इस स्तन में पुस्तक संबंधी कोई भी विशेष जानकारी, जो अन्य स्तनों में नहीं दी जा सकती तथा जो कोई गया है । कभी-कमी इस स्तम्भ में पुस्तक के खो जाने, अलग कर दिये जाने (Write off) व मूल्य वसूल किये
जाने, भेंट-स्वरूप प्राप्ति आदि जैसी महत्वपूर्ण जानकारी भी समय-समय पर लिखी जा सकती
4. परिग्रहण संबंधी आवश्यक निर्देश (Instructions)
परिग्रहण कार्य करते समय कुछ बातें ध्यान में रखना अति आवश्यक है, जैसे 1. परिग्रहण कार्य अत्यंत उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य है, अत: इसे सावधानीपूर्वक करें । जहां
तक संभव हो इसमें कोई गलती न करें । 2. परिग्रहण सुवाच्य लिखावट में तथा पक्की स्याही से करें । 3. कमी भी दो पुस्तकों को एक ही परिग्रहण संख्या नहीं दी जानी चाहिए । 4. प्रचार सामग्री, लघु-पुस्तिकाएं (Pamphlets) आदि का इसमें समावेश न करें, विशेष सूचना अथवा जानकारी कुछ समय पश्चात प्राप्त होती है, दर्ज कर ली जाती है, जैसा ऊपर 16 वें कॉलम में बताया  अन्यथा खो जाने पर इनकी भी जिम्मेदारी पुस्तकालयाध्यक्ष की हो जाती है । 

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