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21 वी सदी में सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग

21 वी सदी में सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग

आधुनिक युग में मानव प्रबंध (personnel management) ने बहुत ही महत्ता हासिल कर ली है । जब तक किसी भी संगठन में मानव संसाधन की भर्ती एवं प्रक्रिया ठीक प्रकार से व्यवस्था नहीं की जाती है तब तक कोई भी कार्यालय संगठन पुस्तकालय कुशलता पूर्वक नहीं संचालित किये जा सकते हैं । इसलिए उपयुक्त नियुक्ति करना अतिआवश्यक है । हमारे पुस्तकालय अनेक वर्षा से विद्यमान है ।अतः अब इस क्षेत्र में प्रतिमाओं की कमी नहीं है और सुगमता से उपयुक्त नियुक्ति कर सकते हैं । हमारे लिए इस 21 वी सदी में सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करना आवश्यक हो गया है । हमें यह देखना चाहिए कि क्या हमारे पास निम्नलिखित सुविधायें उपलब्ध हैं|
1. क्या पुस्तकालयों को मशीनें उपलब्ध करायी गयी हैं जैसे टाइपराइटर, जीरोक्स मशीन, टेलीफोन, कम्प्यूटर इत्यादि आधारभूत मशीने हैं जो प्रत्येक प्रकार के पुस्तकालय में उपलब्ध होनी चाहिए ।
2. क्या इन मशीनों को चलाने (handle) के लिए हमारे पास प्रशिक्षित मानव संसाधन हैं।
3. यह भी देखना आवश्यक है कि पुस्तकालयों को पाठ्य सामग्री के संरक्षण के लिए अधिक ध्यान देना आवश्यक है अथवा सूचना प्रौदयोगिकी की ओर | अभी तक इस ओर कोई निर्णय नहीं लिया गया है ।
पुस्तकालय में कई स्तर के पद होते है जो पुस्तकालय संग्रह की विशालता पर निर्भर करते है । इस संदर्भ में अभी तक कोई निश्चित मानवीकरण का विकास नहीं हुआ है । वैसे यह बिन्दु निम्नलिखित घटकों पर निर्भर करते हैं
1. कार्यभार (work load)
2. वित्त (finance)
3. प्राधिकरण से संबंध (approach to authorities)
4. पुस्तकालयाध्यक्ष की निपुणता (skill to librarian)
 5. किस परिस्थिति में अमुक पद की स्वीकृति प्राप्त होना (circumstances at the time of sanction)
अनेक बार ऐसा प्रतीत होता है कि जहां तक स्टाफ स्वीकृति का प्रश्न है इसमें दूरदर्शिता एवं विचारों की कमी लगती है ।
विभिन्न पुस्तकालयों में नियुक्तिकरण विभिन्न प्रकार की होती है । इनके अतिरिक्त पुस्तकालय समितियों का गठन, उसके कार्य, प्राधिकरण, संविधान इत्यादि लिखित रूप में हो तो उत्तम है साधारणतया पुस्तकालयों में यदि कोई पुस्तकालय समिति का प्रावधान नहीं है तो फिर उस स्थिति में पुस्तकालयाध्यक्ष निदेशक अर्थात संस्था का सर्वोच्च अधिकारी मिलकर पुस्तकालय प्राधिकरण की रचना करते हैं । नियुक्ति के बाद प्रशिक्षण, उचित अनुभाग में पदस्थापन आदि महत्वपूर्ण निर्णय आवश्यक होते हैं ।

 3.4 संचालन अथवा निर्देशित करना (Direction)

निर्देशित करना अथवा संचालन कार्य किसी भी पुस्तकालय प्रबंध का एक प्रमुख कार्य है। इसका आशय है अधीनस्थों से कार्य लेना । अधीनस्थों से काम लेने हेतु उसके मार्गदर्शन तथा प्रभावपूर्ण पर्यवेक्षण की आवश्यकता पड़ती है | अत: प्रबंधकीय कार्यों में संचालन से आशय अधीनस्थों का पथ प्रदर्शन तथा पर्यवेक्षण करना है । एक योग्य संचालन अपने प्रभावपूर्ण दल के रूप में संयोजन करके श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त करने में समर्थ होता है | संचालन का स्थान नियोजन संगठन एवं नियुक्तियों के उपरान्त किन्तु नियंत्रण एवं निरीक्षण से पूर्व है । उचित संचालन के अभाव में नियोजन, संगठन एवं नियुक्तियां व्यर्थ सिद्ध होती है । अत: नियंत्रण तथा निरीक्षण का तो प्रश्न ही नहीं उठता । जार्ज आर. सी. टेरी. में संचालन को गति देना माना है | मार्शल डीमोक ने कहा है कि संचालन प्रशासन का हृदय है जिसके अंतर्गत क्षेत्र का निर्धारण आदेशों तथा निर्देशों को देना एवं गतिशील नेतृत्व प्रदान करना है ।।
पुस्तकालय संदर्भ में जब तक पुस्तकालयाध्यक्ष यह न समझ लें कि उसके अधीनस्थ कर्मचारियों को क्या करना है तब तक पुस्तकालयाध्यक्ष को सफलता नहीं प्राप्त हो सकती है । प्रबंध के अन्य सभी कार्यों तथा संचालन की तुलना में एक सुस्त मोटरगाड़ी में केवल बैठने एवं उसके इंजन को चालू करके उसे गियर में डालने के अंतर से की जा सकती अनुप्रयोग।
पुस्तकालय संगठन में संचालन का महत्व निम्न बिन्दुओं से और भी स्पष्ट हो जाता है।
(1) संचालन अधीनस्थ कर्मचारियों की विभक्ताओं तथा क्षमताओं का अधिक उपयोग संभव बनाता है।
 (2) संचालन संगठन में परिवर्तनों को सुलभ बनाता है।
 (3) संचालन कर्मचारियों कर क्रियाओं को प्रेरित करता है।
(4) संचालन ही संगठन में स्थायित्व एवं संतुलन प्रदान करता है जिस प्रकार बिना पतवार के नाव तनिक आगे नहीं बढ़ सकती, ठीक इसी प्रकार बिना पुस्तकालयाध्यक्ष के पुस्तकालय अपने प्रबंध कार्यों का निष्पादन नहीं कर सकता । फलत: निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पग-पग पर पुस्तकालय प्रबंध की संचालन की आवश्यकता पड़ती है ।

3.5 समन्वय (Co-ordination)

कुण्ट्ज एवं ओडोनेल के अनुसार समन्वय प्रबंध का सार है किन्तु उसकी सफलता संगठन के प्रत्येक सदस्य के प्रयत्नों पर निर्भर करती है । बिखरे हुए तंत्रों को किसी नियत उद्देश्यों से श्रृंखलाबद्ध करना एवं एक सूत्र में पिरोना ही ' 'समन्वय' ' कहलाता है । समन्वय से लोग एक टीम के रूप में कार्य करते हैं । उदाहरण के लिए किसी भी पुस्तकालय में अनेक अनुभाग होते हैं जैसे- टेक्नीकल अनुभाग, संदर्भ अनुभाग, पत्र-पत्रिका अनुभाग, जिल्दबंदी अनुभाग, पुस्तक लेन-देन अनुभाग, पुस्तक चयन एवं खरीद अनुभाग तथा माईक्रोफिल्म अनुभाग इत्यादि । यदि इन विभिन्न अनुभागों के मध्य पारस्परिक एकता एवं तालमेल नहीं हो तो पुस्तकालय कार्य एक दिन भी सफलता पूर्वक नहीं चल सकेगा ।
जॉर्ज आर. टेरी के अनुसार समन्वय निर्वाचित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नों का नियमित समाकलन (synchronization) है, ताकि निष्पादन की उपयुक्त मात्रा, समय तथा संचालन की क्रियाओं में सामंजस्य एवं एकता स्थापित हो जाये | किसी भी पुस्तकालय का उद्देश्य पाठकों को पाठ्य सामग्री तथा सूचना सेवाएं उपलब्ध करवाना है । पुस्तक संग्रह निर्माण में आपसी समन्वय का होना अतिआवश्यक है । इससे व्यर्थ का समय तथा पैसा बरबाद होने से बचाया जा सकता है ।
आधुनिक युग में शैक्षणिक, विशिष्ट एवं शोध पुस्तकालयों के कार्यभार में वृद्धि हुई है । अत: पुस्तकालयों के - विभिन्न अनुभागों में आपसी समन्वय होना आवश्यक है । अत: किसी भी पुस्तकालय प्रबंधक का कर्तव्य यह है कि पुस्तकालय के विभिन्न क्रियाकलापों जो किसी एक अनुभाग से संबंधित नहीं है उनका समन्वय करके पुस्तकालय प्रशासन में निर्बाध लाये । समन्वय प्रक्रिया किसी भी पुस्तकालय के लिए अतिआवश्यक है । समन्वय पुस्तकालय के किसी भी दो अनुभागों के मध्य हो सकता है जैसे- तकनीकी अनुभाग का प्रबंध सफलतापूर्वक करने हेतु निम्नलिखित अनुभागों से समन्वय करना होगा ।

3.5.1 संदर्भ अनुभाग (Reference section)

किसी भी संदर्भ अनुभाग की संग्रह व्यवस्था के पीछे उपयुक्त तकनीकी कार्य होना आवश्यक है | 

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